ऊबड़-खाबड़ जानलेवा पहाड़, दलदली नमकीन मिट्टी व जला देने वाले रेगिस्तान बन सकते हैं अमेरिकी फौज की राह में बाधा
टाकिंग पंजाब
नई दिल्ली। ईरान व अमेरिका के बीच चल रहा युद्द विराम होने का नाम नहीं ले रहा है। एक तरफ जहां अमेरिका महाशक्ति के गरूर से ओत-प्रोत होकर पीछे हटने को तैयार नहीं है, वहीं ईरान भी इस बार आर-पार की लड़ाई के मूढ में दिखाई दे रहा है। अमेरिका बड़े युद्धपोत, विमानवाहक पोत व मरीन कमांडो के साथ ईरान के खिलाफ फाइनल अटैक की तैयारी कर रहा है, लेकिन ईरान की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि वहां किसी दूसरे देश का जमीनी हमला कर कब्जा करना बेहद खतरनाक है। सीधी चढ़ाई वाले ऊंचे पहाड़ों, शरीर को जला देने वाले रेगिस्तानों व समुद्र से घिरी ईरान की सीमा को पार करना मौत के किले में घुसने से कम नहीं है। ईरान की पहाड़ी चोटियां बेहद ऊबड़-खाबड़ हैं, जबकि दलदली नमकीन मिट्टी वाले रेगिस्तान गर्मी में 70 डिग्री तापमान के साथ किसी भी फौज के लिए काल साबित हो सकते हैं। अगर कोई देश एड़ी चोटी का जोर लगाकर घुस भी जाए तो वहां टिके रहना मुश्किल है। विशेषज्ञ यहां तक कह रहे हैं कि ईरान कहीं अमेरिका के लिए दूसरा वियतनाम न बन जाए। इजरायल के साथ युद्ध में उतरे अमेरिका ने ईरान में संभावित ग्राउंड ऑपरेशन के लिए 3500 मरीन कमांडो उतार दिए हैं। अमेरिकी सेंट्रल कमांड का एक और युद्धपोत यूएसएस ट्रिपोली 2500 सैनिक लेकर ऑपरेशन जोन में पहुंच चुका है, जबकि यूएसएस बॉक्सर, यूएसएसल अब्राहम लिंकन जैसे एयरक्रॉफ्ट करियर पहले ही मोर्चा संभाले हुए हैं। एफ-35, एफ-18 जैसे लड़ाकू विमानों से लैस ये एयरक्रॉफ्ट करियर समुद्री और हवाई हमलों के साथ समुद्र में एक चलती-फिरती फौज माने जाते हैं। माना जा रहा है अमेरिका ईरान के खार्ग दीप या होर्मुज स्ट्रेट के इलाके में बड़ी सैन्य कार्रवाई को अंजाम दे सकता है। दरअसल ईरान का अधिकांश हिस्सा एक ऊंचे पठार पर स्थित है, जिसकी औसत ऊंचाई समुद्र तल से 900 मीटर से 1500 मीटर के बीच है।. यह पठार चारों ओर से विशाल पर्वत शृंखलाओं से घिरा हुआ है, जो इसे बाहरी आक्रमणों से प्राकृतिक सुरक्षा प्रदान करता है। ईरान की सीमा पर बेहद खतरनाक पहाड़ी इलाके हैं। इसमें जाग्रोस पर्वत ईरान के पश्चिमी इलाके और दक्षिण-पश्चिमी इलाके में 1500 किलोमीटर लंबी पर्वतमाला की तरह है। इसकी चोटियां 4000 मीटर से भी ऊंची हैं। यह क्षेत्र इतना ऊबड़-खाबड़ है व सीधी चोटियां वाला है कि यहां सेनाओं का गुजरना व रसद हथियार पहुचाना असंभव माना जाता है। इसके अलावा अल्बोर्ज की पहाड़ियां उत्तर में कैस्पियन सागर के किनारे है। ईरान की सबसे ऊंची चोटी माउंट दामावंद 5610 मीटर की है। ये उत्तर से आने वाली बर्फीली हवाओं व दुश्मनों के लिए एक मजबूत दीवार का काम करती है। ईरान के बीचों-बीच दो जोखिम भरे रेगिस्तान हैं, जहां इंसानों का रहना नामुमिकन सा है। दश्त-ए-काविर को महान नमक का रेगिस्तान कहा जाता है। यहां दलदली नमकीन मिट्टी है, जो किसी भी सैन्य वाहन या जांबाज फौज के लिए भी मौत का जाल बन सकती है। ईरान में दश्त-ए-लुत दुनिया के सबसे गर्म जगहों में से एक है। यहां तापमान 70 डिग्री तक पहुंच जाता है। इसकी रेत के टीले व चट्टानें इसे एक अभेद्य किला बना देती हैं, जहां से जिंदा बाहर निकलना असंभव सा है। ईरान की समुद्री सीमाएं भी बहुत अहम व दुर्गम हैं। हॉर्मुजजलडमरूमध्य दुनिया का सबसे अहम तेल-गैस रास्ता है। इस संकरे समुद्री गलियारे से दुनिया के 20 फीसदी तेल-गैस के जहाज गुजरते हैं। होर्मुज के आसपास दुर्गम इलाकों से निगरानी व पहाड़ों के अंदर मिसाइलों और ड्रोन के जखीरों से वो हमले करता है। ईरान की उत्तरी सीमा में कैस्पियन सागर है। यह दुनिया की सबसे बड़ी झील कैस्पियन सागर से घिरा है, जो इसे रूस और मध्य एशिया से जोड़ता है। यहां से भी दुश्मन का ईरान में प्रवेश करना मुश्किल है। ईरान केवल पहाड़ों, रेगिस्तान के कारण अजेय नहीं है, यहां की जलवायु में भी जिंदा रहना आसान नहीं है। ईरान की उत्तरी सीमा में घने जंगल हैं, जहां घनघोर बारिश होती है। दक्षिणी इलाकों में भीषण गर्मी व आर्द्रता है। सर्दियों में पहाड़ों पर इतनी बर्फ गिरती है कि कई इलाकों का संपर्क हफ्तों तक देश से कटा रहता है। ईरान दुनिया के सबसे जोखिम भरे भूकंपीय इलाकों में से एक है। यहां की जमीन लगातार टेक्टोनिक प्लेट की हलचलों से गुजरती है, जिससे यहां स्थायी और भारी इंफ्रास्ट्रक्चर बनाना बड़ी चुनौती है। इन सभी बातों को देखते हुए ऐसा लगता है कि ईरान पर जमीनी हमला कर, उसे परास्त करना इतना आसान नहीं है।