
सत्ता के इस सफर में आप के कई विधायक व मंत्री खुद ही भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी व अन्य गंभीर आरोपों में घिरते आए नजर
टाकिंग पंजाब
चंडीगढ। साल 2022 के विधानसभा चुनावों में पंजाब की सभी राजनीतिक पार्टीयों को पछाड़ कर सत्ता में आई आम आदमी पार्टी के वह आम आदमी विधायक बने थे, जिनके बारे में कोई सोच भी नहीं सकता था। समय का पहिया घूमा ओर धीरे धीरे आप के जो आम विधायक कहे जाते थे, खास होते चले गए। नतीजन, भ्रष्टाचार के खिलाफ “जीरो टॉलरेंस” की नीति को अपनाने के वादे के साथ सत्ता में आप के कई विधायक व मंत्री खुद ही भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी व अन्य गंभीर आरोपों में घिरते नजर आए। हालांकि इन मामलों में सरकार ने अपने ही नेताओं पर कार्रवाई करके अपनी पारदर्शिता व सख्ती का प्रमाण दिया, लेकिन विपक्ष ने इन मुद्दों को भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
सबसे ताजा मामले की बात करें तो अमृतसर में वेयरहाउस के डीएम गगनदीप सिंह रंधावा की आत्महत्या केस में पूर्व मंत्री लालजीत भुल्लर कानून के शिकंजे में फंस चुके हैं। यह मामला इतना बढा कि संसद तक इसकी गूंज सुनी गई व देश के गृह मंत्री तक ने इसकी जांच सीबीआई से करवाने की बात कही थी। हालांकि पंजाब सरकार की तरफ से तुरंत की ई कार्रवाई के तहत भुल्लर को गिरफ्तार कर लिया गया था। इस मामले में कोर्ट ने भुल्लर को 3 दिन के पुलिस रिमांड पर भेज दिया है। पुलिस ने इस मामले में लालजीत भुल्लर, उनके पिता व पीए के खिलाफ आत्महत्या को उकसाने का मामला दर्ज किया था।
आम आदमी पार्टी के बड़े नेताओं के कानून के शिकंजे में आने की बात करें तो सबसे पहला व बड़ा मामला सरकार बनने के कुछ ही महीनों बाद सामने आ गया था, जब तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री डॉ. विजय सिंगला को भ्रष्टाचार के आरोप में गिरफ्तार कर जेल भेजा गया। आप ने इसे भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस का उदाहरण बताया। बाद में सिंगला को जमानत मिल गई और वह राजनीतिक गतिविधियों में फिर सक्रिय हो गए। इसके बाद बठिंडा ग्रामीण से विधायक अमित रतन कोटफत्ता पर अपने करीबी के जरिए 25 लाख की सरकारी ग्रांट जारी करवाने के बदले 4 लाख की रिश्वत मांगने के आरोप लगे। इस मामले में उन्हें पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट से जमानत मिली, लेकिन केस अब भी अदालत में लंबित है।
तीसरा बड़ा मामला अमरगढ़ से विधायक जसवंत सिंह गज्जनमाजरा का रहा, जिन्हें प्रवर्तन निदेशालय ने 41 करोड़ रुपये के बैंक धोखाधड़ी मामले में गिरफ्तार किया। गज्जनमाजरा को करीब छह महीने जेल में रहना पड़ा, जिसके बाद उन्हें 2024 में हाईकोर्ट से जमानत मिली। इसके बाद जालंधर सेंट्रल के विधायक रमन अरोड़ा पर आरोप लगा कि वह लोगों को अवैध निर्माण के नाम पर झूठे नोटिस भिजवाते थे व बाद में पैसे लेकर मामलों को सेटल किया जाता था। 2025 में उनकी गिरफ्तारी हुई ओर वह 2026 में जमानत पर बाहर आ गए। अब वह राजनीति से दूर होकर धार्मिक कार्यक्रमों में मग्न हैं।
एक अन्य मामले में कैबिनेट मंत्री फौजा सिंह सरारी को एक कथित ऑडियो क्लिप वायरल होने के बाद बढ़ते राजनीतिक दबाव के चलते इस्तीफा देना पड़ा था। मंत्री हरमीत सिंह पठानमाजरा खिलाफ पटियाला में धोखाधड़ी, शादी का झांसा देकर शोषण व धमकी देने जैसे आरोपों में एफआईआर दर्ज हुई। मामला सामने आने के बाद उन्हें भी मंत्री पद से हटना पड़ा था। आज रविवार को चार दिनों का पुलिस रिमांड खत्म होने पर उन्हें अदालत में पेश किया गया। इस दौरान पुलिस ने पूछताछ के लिए पठान माजरा के और 10 दिन के रिमांड की मांग की। अदालत में दोनों पक्षों को सुनने के बाद पठानमाजरा को 7 दिनों के रिमांड पर भेज दिया।
इसी तरह मंत्री लालचंद कटारूचक पर भी एक कथित वीडियो को लेकर गंभीर आरोप लगे थे। मामला बढ़ने पर जांच बैठाई गई। हालांकि बाद में शिकायतकर्ता द्वारा आरोप वापस लेने व पर्याप्त सबूत न मिलने के चलते उन्हें क्लीन चिट दे दी गई और वह अपने पद पर बने रहे। कुल मिलाकर, सरकार ने अपने ही नेताओं के खिलाफ कार्रवाई कर “जीरो टॉलरेंस” की नीति को लागू करने की पूरी कोशिश की है, लेकिन विपक्ष इसे सिस्टम की कमजोरी व राजनीतिक असफलता के रूप में पेश कर रहा है। अब देखते हैं कि 2027 चुनावों में जनता की अदालत इन आरोपों पर क्या फैंसला सुनाती है।


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