अरब देशों से युद्ध का खर्च में हिस्सेदारी मांग सकते हैं अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप.. व्हाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी कैरोलिन लेविट ने की पुष्टि
टाकिंग पंजाब
वाशिंगटन। यह बात आज भी सच्च है कि युद्द किसी भी समस्या का हल नहीं है। एक व्यक्ति कितना भी ताकतवर क्यों न हो, लेकिन कमजोर व्यक्ति भी कहीं व कहीं, किसी न किसी तरह से ताकतवर का नुक्सान तो कर सकता है। यह बात अमेरिका व इजरायल ने शायद सोची ही नही थी, जो अब इन देशों पर भारी पड़ रही है। ईरान के खिलाफ जंग छेड़कर अमेरिका खुद को एक शक्तिशाली देश दिखाने व अपने अहम व वहम के चलते काफी दिक्कत में आ गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने इस जंग को शुरू तो कर दिया, लेकिन अब यह जंग उसके लिए मुसिबत बनती जा रही है।
एक अखबार के अनुसार अमेरिका व इजरायल की इरान के साथ छेड़ी इस जंग का भारी-भरकम आर्थिक असर भी दिखने लगा है। अमेरिका की तरफ से इस युद्ध में पानी की तरह अरबों डॉलर बहाए जा रहे हैं। इसी बीच व्हाइट हाउस के एक ताजा संकेत ने पूरी दुनिया में नई बहस छेड़ दी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अब इस महायुद्ध का वित्तीय बोझ अकेले उठाने के मूड में नहीं दिख रहे हैं। व्हाइट हाउस ने इशारों-इशारों में यह साफ कर दिया है कि अमेरिका अब अरब देशों से इस युद्ध के खर्च में हिस्सेदारी मांग सकता है। ऐसे में यह बड़ा सवाल उठ खड़ा हुआ है कि क्या ईरान के खिलाफ जंग का बिल अब अरब देशों को चुकाना पड़ेगा।
व्हाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी कैरोलिन लेविट ने मीडिया से बातचीत में इस बात की पुष्टि की है। उन्होंने बताया कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अरब देशों से इस अमेरिका-इजरायल युद्ध का खर्च साझा करने के लिए मदद मांगने में काफी दिलचस्पी दिखा रहे हैं। प्रेस ब्रीफिंग के दौरान लेविट ने स्पष्ट किया कि हालांकि वह अभी इस मुद्दे पर आगे बढ़कर कुछ नहीं कहेंगी, लेकिन यह निश्चित रूप से एक ऐसा विचार है जिस पर ट्रंप गंभीरता से सोच रहे हैं और आने वाले समय में इस पर खुलकर बात की जा सकती है। दरअसल इस युद्ध की लागत अमेरिका के लिए चौंकाने वाली साबित हो रही है।
इस महीने की शुरुआत में पेंटागन के अधिकारियों ने अमेरिकी कांग्रेस को बताया था कि ईरान के खिलाफ युद्ध के शुरुआती छह दिनों में ही ट्रंप प्रशासन ने 11.3 अरब डॉलर से ज्यादा खर्च कर दिए हैं। वहीं, एक मीडिया रिपोर्ट में पूर्व पेंटागन बजट अधिकारी एलेन मैककस्कर के अनुमान के हवाले से बताया गया है कि युद्ध के पहले तीन हफ्तों में पेंटागन को करीब 1.4 अरब से 2.9 अरब डॉलर की लागत उठानी पड़ी है। खर्च का सिलसिला यहीं नहीं रुक रहा है, बल्कि व्हाइट हाउस ने कांग्रेस से कम से कम 200 अरब डॉलर के अतिरिक्त सैन्य बजट की भी मांग की है ताकि सैन्य अभियानों को जारी रखा जा सके और हथियारों के खाली हो रहे भंडार को दोबारा भरा जा सके।
युद्ध के कारण वैश्विक स्तर पर ऊर्जा की कीमतों में आ रहे उछाल पर लेविट ने सफाई देते हुए कहा कि यह बढ़ोतरी पूरी तरह से अस्थायी है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि ईरान को जड़ से कमजोर करने पर लंबे समय में अमेरिका और दुनिया को फायदा होगा। पुराने खाड़ी युद्ध का जिक्र करते हुए लेविट ने याद दिलाया कि तब अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र के समर्थन और अरब देशों के विशेष अनुरोध पर इराक के खिलाफ कार्रवाई की थी, लेकिन मौजूदा हालात बिल्कुल अलग हैं, जहां ईरान के खिलाफ अमेरिका और इजरायल काफी हद तक अकेले ही यह लड़ाई लड़ रहे हैं। उन्हें पहले जैसा अंतरराष्ट्रीय या क्षेत्रीय समर्थन प्राप्त नहीं हो रहा है।










